Joint FD New Rule: फिक्स्ड डिपॉजिट यानी FD को हमेशा से एक सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता रहा है। बहुत से लोग इसे व्यक्तिगत ज़रूरतों के लिए करते हैं, वहीं कई लोग संयुक्त यानी Joint FD New Rule बनवाते हैं ताकि परिवार के किसी सदस्य के साथ मिलकर भविष्य की योजनाओं को सुरक्षित किया जा सके। लेकिन अब आयकर विभाग (Income Tax Department) के नए नियमों ने ऐसे निवेशकों की परेशानी बढ़ा दी है।
दरअसल, अगर कोई FD 10 लाख रुपये या उससे अधिक की राशि में है और वह जॉइंट नाम पर है, तो बैंक इसकी जानकारी दोनों खाताधारकों के पैन कार्ड पर रिपोर्ट करता है। भले ही निवेश की राशि सिर्फ एक व्यक्ति ने लगाई हो, लेकिन रिपोर्टिंग सिस्टम में पूरी रकम दोनों के नाम पर दिखाई देती है। इसका नतीजा यह होता है कि टैक्स से जुड़ी दिक्कतें खड़ी हो जाती हैं और कई बार टैक्स नोटिस भी आ सकता है।
डुप्लीकेट रिपोर्टिंग की समस्या
Joint FD New Rule खासतौर पर उन लोगों के लिए परेशानी खड़ी कर रहा है, जिनकी आय बहुत कम या बिल्कुल नहीं है, जैसे गृहिणियाँ या सेवानिवृत्त माता-पिता। उदाहरण के लिए, अगर बेटे ने 15 लाख रुपये की Joint FD करवाई और अपनी माँ का नाम केवल सह-खाताधारक के तौर पर जोड़ दिया, तो आयकर विभाग की प्रणाली में पूरी राशि दोनों के नाम पर दिखाई देगी। इससे माँ की आयकर स्टेटमेंट में भी यह राशि जुड़ जाएगी, जबकि उन्होंने न तो पैसा निवेश किया और न ही उससे कोई फायदा लिया।
ऐसी स्थिति में माँ जैसे लोगों के लिए टैक्स नोटिस आने की संभावना बढ़ जाती है। यह डुप्लीकेट रिपोर्टिंग सिस्टम की एक बड़ी खामी है, जिससे हजारों लोग अनजाने में टैक्स संबंधी परेशानियों का सामना कर रहे हैं।
असली निवेशक कौन?
टैक्स कानून साफ कहता है कि टैक्स उसी व्यक्ति पर लगना चाहिए जिसने वास्तविक निवेश किया हो। लेकिन जब FD जॉइंट होती है, तो बैंक यह स्पष्ट नहीं करता कि पैसा किसने लगाया। नतीजा यह होता है कि इनकम टैक्स सिस्टम दोनों नामों पर बराबर राशि दिखाता है।
मान लीजिए किसी बेटी ने अपनी कमाई से FD बनाई और माँ का नाम सिर्फ जॉइंट नाम के तौर पर जोड़ा, तो उस FD की रकम माँ की टैक्स स्टेटमेंट में भी दर्ज होगी। इस वजह से उनके इनकम टैक्स रिटर्न में गड़बड़ी हो सकती है और अनावश्यक टैक्स नोटिस आ सकता है।
टीडीएस कटौती में उलझन
समस्या यहीं खत्म नहीं होती। जब FD पर ब्याज मिलता है और वह तय सीमा से ऊपर होता है, तो बैंक उस पर टीडीएस (Tax Deduction at Source) काटता है। लेकिन अधिकतर मामलों में यह कटौती सिर्फ मुख्य खाताधारक के पैन पर दर्ज होती है। यानी जिसने वास्तव में निवेश किया है, उसके खाते में टीडीएस का कोई रिकॉर्ड नहीं दिखता। वहीं, सह-खाताधारक के पैन पर पूरी इनकम जुड़ जाती है।
नतीजा यह होता है कि इनकम टैक्स रिटर्न, फॉर्म 26AS और AIS जैसी रिपोर्टों में गड़बड़ नज़र आने लगती है। बाद में जब आयकर विभाग इन दस्तावेजों को मिलान करता है, तो असमानता साफ दिख जाती है और टैक्सपेयर्स को नोटिस झेलना पड़ता है।
टैक्स नोटिस से बचने के उपाय
अगर आप Joint FD New Rule करवा रहे हैं, तो कुछ ज़रूरी सावधानियाँ अपनाना बेहद जरूरी है। सबसे पहले, बैंक को वही पैन कार्ड दें जिसने वास्तव में निवेश किया है। अगर जॉइंट नाम डालना ज़रूरी है, तो बैंक को लिखित में बताएं कि असली निवेशक कौन है।
इसके अलावा, हर साल अपनी AIS और TIS रिपोर्ट को ध्यान से जांचें। अगर कोई गड़बड़ी मिले तो समय रहते सुधार करें। आयकर रिटर्न भरते समय सही जानकारी दें और ज़रूरत पड़ने पर किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट की मदद लें। साथ ही, फंड ट्रांसफर स्लिप, गिफ्ट डीड जैसे डॉक्यूमेंट्स हमेशा सुरक्षित रखें ताकि यह साबित हो सके कि पैसा किसका है।
सुधार की ज़रूरत
सरकार का मकसद इन नियमों के जरिए टैक्स चोरी रोकना और पारदर्शिता लाना था। लेकिन हकीकत यह है कि Joint FD New Rule के मामलों में यह नियम उलझन पैदा कर रहे हैं। डिजिटल रिपोर्टिंग सिस्टम असली निवेशक और सिर्फ नामधारी खाताधारक में फर्क नहीं कर पाता।
जरूरत है कि सरकार इस नियम की समीक्षा करे और बैंकिंग प्रणाली में ऐसे बदलाव लाए जिससे रिपोर्टिंग पारदर्शी हो। खासतौर पर यह सुनिश्चित किया जाए कि टीडीएस और इनकम रिपोर्टिंग सिर्फ असली निवेशक के पैन पर ही हो। जब तक ऐसे सुधार नहीं होते, आम लोगों को बेहद सतर्क रहना होगा और दस्तावेजों में सटीक जानकारी देना ही सबसे बड़ी सुरक्षा होगी।
निष्कर्ष
संयुक्त Joint FD New Rule जैसी सुविधा जो पहले निवेशकों के लिए आसान और सहयोग का प्रतीक मानी जाती थी, अब टैक्स सिस्टम की खामियों की वजह से सिरदर्द बन गई है। कई लोग, जिन्होंने निवेश तक नहीं किया, टैक्स रिपोर्टिंग के झमेले में फंस रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि FD करवाते समय समझदारी से निर्णय लें, बैंक को पूरी जानकारी दें और हर साल अपनी टैक्स रिपोर्टिंग की जांच करें।